सोमवार, 29 दिसंबर 2014

'सुशासन-दिवस' पर तकनीकी भाषण

25 दिसंबर 2014 को भारत सरकार की तरफ से 'भारतीय भारतीय सुशासन दिवस' घोषित किया गया।25 दिसंबर जन्मदिवस है-जीसस क्राइस्ट,मदन मोहन मालवीय,अटल बिहारी वाजपेयी,मोहम्मद अली जिन्ना और नवाज़ शरीफ़ का।यूँ तो भारतीय समाज के परिपेक्ष्य में सुशासन की अवधारणा जितनी नयी प्रतीत होती है,इसकी जड़े उतनी ही पुरानी और गहरी है।प्राचीन काल से ही हर शासक और हर एक बादशाह ने इसे अपनी सत्ता में लागू करना चाहा है। उन्हें सत्ता चाहे विरासत में मिली हो या फिर उन्होंने युद्ध में जीती हो लेकिन उनकी ख्वाहिश सिर्फ एक रही- सुशासन। क्योंकि ये सुशासन ही है जो किसी सत्ता की वैलिडिटी और डेवलपमेंट को वारेंटी प्रदान करता है। सुशासन की इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए,इस संगोष्ठी और भाषण-प्रतियोगिता का आयोजन किया गया-जिसमें सुशासन के लिए तकनीक और प्रौधिकी के उपयोग को केंद्रित किया गया है।  
 
सुशासन क्या है?
        अब सवाल है कि एक सुशासन के मानक क्या हो?जिनके आधार पर सुशासन को परिभाषित किया जाए?संयुंक्त राष्ट्र में सुशासन के कुल आठ मानक बताये है:-
1.विधि का शासन
2.समानता
3.भागीदारी
4.अनुक्रियता
5.बहुमत
6.प्रभावशाली दक्षता
7.पारदर्शिता
8.उत्तरदायित्व
      जिस शासन में,किसी व्यक्ति-विशेष का नहीं बल्कि विधि का शासन हो। जहां समानता हो अवसरों की, न्याय की और जिंदगी जीने की। जिस देश में शासन में किसी एक की नही हर जन की भागीदारी हो,अनुक्रियता हो और नागरिकों का बहुमत हो। शासन में प्रभावशाली दक्षता हो, पारदर्शिता हो, किसी विशेष समूह के समक्ष नहीं नागरिक और शासन-प्रणाली में और जहां उत्तरदायित्व एक का नहीं सबका हो, ये गुण जिस शासन में हो, उस देश का शासन 'सुशासन' कहलाता है।
         
तकनीक क्या है?
        अब बारी आती है टेक्नोलॉजी की। यदि हम तकनीक को सिर्फ रसायन,भौतिकी,और जीव विज्ञान की टर्मिनोलॉजी में परिभाषित करते है तो ये एक तकनीक को परिभाषित करने के का पारम्परिक दृष्टिकोण कहलाएगा। क्योंकि तकनीक का तातपर्य मानव-ज्ञान और उपलब्ध संसाधनो के उपयोग कर  किसी समस्या का समाधान करने और अपनी जरूरतो की पूर्ति करने या प्रयोगशाला में भौतिक चीज़ों की ख़ोज करना मात्र नहीं है। कार्य-कारण को पूर्ण तार्किकता से प्रस्तुत करना 'तकनीक' कहलाता है और इस तकनीक शब्द का प्रयोग हम उन सभी विषयों के लिए करते है जहां हम किसी भी समस्या का समाधान तार्किक सोच या तर्कों के आधार पर करते है।

Innovation क्या है?
Innovation यानी, नवाचार। जिसका शाब्दिक अर्थ है-नई खोज।
       एक नयी खोज तभी एक सफल सोच बन सकती है जब इसे हर इंसान समझ सके और इसे लागू कर सके। जिनके कुछ मूल तत्वों पर प्रकाश डालना ज़रूरी है, क्योंकि कोई भी सच या अच्छी चीज़ तभी सफल हो सकती है जब वह देशकाल और वातावरण के अनुकूल हो।
1.अडोप्टर्स की समझ
2.संचार चैनल
3.समय
4.सामाजिक व्यवस्था।
सुशासन के सन्दर्भ में,जबतक किसी नवाचार को देश के अंतिम नागरिक तक ना पहुंचे तबतक सुशासन की कल्पना भी अधूरी है। क्योंकि सुशासन अपने आप में एक नवाचार है,और जब हम इस नवाचार की बात करते है तो उतनी ही सक्रियता से इसका लागू होना भी आवश्यक है।

भारत में तकनीकी-विकास:-
* भारत आज तकनीक और विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया में एक सशक्त देश के रूप में तो उभर रहा है।
लेकिन वहीँ दूसरी ओर, महिलाओं के लिए इसे जी-20 देशों में सबसे खतरनाक देश घोषित किया गया।

*भारत में हर साल, लाखों- करोड़ों की संख्या में देश के युवा डॉक्टर और इंजीनीयर बनते है,लेकिन इसके बावज़ूद कृषि, दवाओं तथा तकनीकी-विकास सम्बन्धी चीज़ों का निर्यात हम विदेशों से करते है।

*आरटीआई को भारत इ-गवर्नेंस का एक सशक्त हथियार माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर, आरटीआई एक्टिविस्टों की हत्या की घटनाएं दिन-दुगनी और रात-चौगुनी की गति से बढ़ रही है।

*सीसीटीवी कैमरे और न्यू मीडिया की तकनीकी क्रांति तो कई साल पहले भारत में आ गई,लेकिन इसके बावज़ूद, आशाराम बापू,निठारी-हत्याकांड और निर्मल बाबा जैसे तमाम लोगों के गोरख-धंधे फलते-फूलते रहे और देश को खोखला करते रहे। उससे पहले,ना कोई सीसीटीवी इनकी करतूतों की रिकॉर्डिंग कर पाया और ना न्यू-मीडिया के किसी जर्नलिस्ट की कलम इनकी तरफ घूम पायी।

*भारत में 4-जी नेट की स्पीड तो आ गई,लेकिन 2-जी घोटाले के साथ-साथ चारा-घोटाले भी आ गए।

*भारत में अगर बात हो तकनीकी-विकास और हम भारतीय युवाओं के हाथ में दिखते स्मार्टफोन और बैग में टंगे लैपटॉप की बात ना करें,तो कुछ ख़ालीपन महसूस होता है। भारत में आज हर दस युवाओं में से आठ के पास स्मार्टफोन देखने को मिल जाता है और लगभग छः के बैग में लैपटॉप,लेकिन इन युवाओं में से अधिकांश के लैपटॉप और स्मार्टफोन का ज़्यादातर इस्तेमाल नौकरी डॉट कॉम और अन्य साइट्स पर नौकरी खोजते हुए बीतता है।

ये तो चन्द उदाहरण थे,हमारी चमकती तकनीक और जमीनी हक़ीक़त की। जो इस सुनहरी चमक के पीछे का अँधेरे को दिखाती है।
25 दिसंबर को, प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने बनारस के विकास के लिए कुल 1300 करोड़ रूपये दिए। इसके साथ ही,बिजली की खपत कम करने के लिए सोलर प्लांट,लोको शेड,आटोमेटिक स्टोर तथा अन्य उच्च तकनीकों के माध्यम से सुशासन और विकास गति को aceelerate करने के लिए नयी योजनाओं को लागू करने की बात कही।
               लेकिन अगर मैं याद दिलाऊं,हाल में हुई बनारस की एक महिला के साथ छेड़खानी की घटना जिसका विरोध करने पर उसे जला दिया गया। तो आप क्या कहेंगे? क्या यही है, हमारा तकनीकी विकास?

आज हम तकनीक में तो प्रगति कर रहे है लेकिन वहीं दूसरी ओर,व्यवहारिक परिपेक्ष्य में एक फांक देखने को मिलती है। जो किसी भी देश में सुशासन लागू होने में सबसे बड़ी रुकावट है।

स्वाती सिंह

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

महिला सशक्तिकरण के नाम एक और बाज़ारू-चौपाल

      पिछले रविवार को वाराणसी में, एक 'महिला सशक्तिकरण केंद्र' के शुभारम्भ समारोह में जाने का मौका मिला। इस केंद्र की स्थापना वाराणसी के एक नामी एनजीओ की ओर से हुई। इस शुभारम्भ कार्यक्रम में, शहर के कई प्रतिष्ठित हस्तियों में भागीदारी ली। लगभग चार घंटे तक चलने वाले इस कार्यक्रम में, इन सभी माननीयों हस्तियों ने 'महिला-सशक्तिकरण' पर अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये।             
        लेकिन अब प्रश्न आता है कि, आखिर ये विचार क्या थे? क्या इन विचारों का वर्तमान की ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई भी नाता था? कहीं ये विचार किसी किताब से टीपी तो नहीं गई? ये विचार कितने तार्किक थे? इन सब प्रश्नों के जवाब मिल पाना मुश्किल है। क्योंकि हर बार की तरह ये सभी विचारक अपने-अपने पेड़ पर चढ़कर 'महिला-सशक्तिकरण' पर बाग़ देते नज़र आये।      
         दलित-महिलाओं पर लिखने वाली लेखिका ने, पीड़िताओं में दलितों का बहुमत बताया तो वहीं, जिला प्रोबेशन अधिकारी में आर्थिक-तंगी को शोषण का कारण करार दे दिया। अब इन विचारकों व कार्यक्रम के वक्ताओं पर प्रश्न उठता है कि, पीड़ित को पीड़ित के रूप में देखना ज़रूरी है या किसी वर्ग व जाति के आधार पर? और जहां तक रही बात आर्थिक-तंगी की तो क्या अगर आर्थिक रूप से सशक्त होना अगर हर समस्या का समाधान होता तो 'अरुणा राय' जैसे केस हमारे सामने नहीं होते।       
       महिला सशक्तिकरण आज एक ऐसा मुद्दा बन चुका है, जिसपर हर कोई अपना बिना कुछ जाने-समझे हर कोई अपना मत देते फिरता है। इस सबमें ये बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि, महिला-सशक्तिकरण जैसे गम्भीर मुद्दे पर काम करने का आगाज़ तो बेहद ज्वलन्त और सकारात्मकता से शरू हुआ। लेकिन जब इसपर स्वयंसेवी संगठनों और समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी व जागरूक वर्ग ने अपने स्वार्थ की रोटियाँ इस आग पर सेकना शुरू किया,तो वो सकारात्मकता अब दिन-प्रतिदिन ख़ाक में तब्दील होती नज़र आ रही है।   
       हमारे भारतीय समाज में, आज महिला-सशक्तिकरण के परिपेक्ष्य में एक ऐसा इंद्रधनुष देखने को मिल रहा है, जहां के उदभव की चमक सशक्त-महिला से शुरू होती दिखाई पड़ रही है लेकिन इस शुरुआत का अंत एक अन्धकार में जा कर गुम हो जाता है। जहां इसके प्रकाश की सबसे ज़्यादा जरूरत है, क्योंकि यहीं इस आधी आबादी की सर्वाधिक आबादी निवास करती है।   
         आज हमारे समाज में ऐसे केंद्रों की आवश्यकता है लेकिन इससे ज़्यादा आवश्यकता इनकी सूचना उस वर्ग तक पहुंचना आवश्यक है,जहां इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। अगर ऐसे कार्यक्रमों में समाज के एक विशेष अभिजात वर्ग के साथ-साथ ही उस वर्ग की भी भागीदारी उसी संख्या में हो जिनके सशक्त होने की बात की जा रही है तो ये होगी इस सकारात्मक आगाज़ का पहला सशक्त बिगुल।      
       वरना 'महिला सशक्तिकरण' के नाम पर आए दिन सजने वाली इन बाज़ारू चौपालों से सिर्फ अपने स्वार्थ की रोटियाँ ही सेकी जाएंगी।   
       अब आपने कागज़ से बनी जंजीर पर महिला-सम्बन्धी समस्याओं को लिख कर तो फाड़ दिया और कहा कि, महिला आज़ाद हो गई। अगर ये सब इतना आसान होता तो शायद आज हमारे समाज में इन केंद्रों के नाम वाले किसी भी आडम्बर का पनप पाना ना मुमकिन होता।

स्वाती सिंह             

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

दस्यु सुंदरियों की राजनीतिक चुप्पी

उत्तर-प्रदेश में चम्बल नदी के किनारे बसा 'बीहड़ का जंगल' अपने खूंखार जानवरों और खतरनाक डाकुओं के लिए जाना जाता है। सालों से चम्बल नदी के किनारे बसे बीहड़ के इस जंगल ने ना केवल खतरनाक डाकुओं के गिरोहों को पनाह दी, बल्कि इन गिरोहों की वहशी अत्याचारों से मजबूरन बनती 'दस्यु सुंदरी'  के इतिहास का साक्षी भी बना।
 

       
दस्यु सुंदरी की कहानी शुरू होती है - उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव 'गुरु के पुरवा' में रहने वाली 'फूलन देवी' के साथ। फूलन को साल 1979 में बीहड़ के कुछ  डाकुओं ने अगवा कर लिया था। यूँ तो फूलन देवी को भी एक खतरनाक डाकू के रूप में जाना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि फूलन को यह पहचान उन्हें विरासत में मिली| उनके साथ, समाज तथाकथित उच्च-वर्ग के लोगों और कई डाकुओं ने सामूहिक बलात्कार किया। इतना ही नहीं, उन्हें गाँव में सरेआम निर्वस्त्र भी किया गया। माना जाता है कि फूलन के साथ ऐसा इसलिए किया गया क्यूंकि उसका जन्म नीची-जाति में हुआ था और उसे समाज के तथाकथित ऊची जातियों का अत्याचार गवारा नहीं था, जिसके खिलाफ फूलन ने आवाज उठाई। एक नीची-जाति की औरत की यह जुर्रत उन्हें तनिक भी रास नहीं आयी और उन्होंने फूलन की अस्मिता को तार-तार कर उन्हें खत्म करने की नाकाम कोशिश की। पर दुर्भाग्यवश वे समाज की बनाई लड़की को मारने में तो सफल रहे पर नारी-शक्ति को न मार सके| आख़िरकार उन्हें एक साधारण लड़की ‘फूलन’ से बनी 'दस्यु सुंदरी' के हाथों ढेर होना पड़ा। फूलन ने इसके बाद, पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सजा खत्म होने के बाद फूलन ने अपनी जैसी तमाम लड़कियों की मदद करने के लिए राजनीति में कदम रखा।

दस्यु सुंदरी बनने का सिलसिला यहीं नहीं थमा।





साल 1983 में बीहड़ के डाकुओं ने,  उत्तर प्रदेश के औराई जिले की सीमा परिहार का अपहरण किया।  सीमा परिहार पर भी डाकुओं ने अत्याचार किया। जिसके बाद, सीमा परिहार भी फूलन देवी की तरह एक खतरनाक डाकू के रूप में जानी जाने लगी। सीमा परिहार ने भी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। सीमा ने समाज-सेवा करने के लिए साल 2007 में उत्तर-प्रदेश के भदोही जिले से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। लेकिन सीमा को राजनीति के दावपेंच रास नहीं आए और उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। सीमा परिहार ने महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए 'ग्रीन गैंग' बनाया।



फूलन देवी और सीमा परिहार के बाद, हाल ही में रेणु यादव का नाम सामने आया है। जो बीहड़ की बनाई हुई एक और दस्यु सुंदरी है। औरैया के जमालीपुर की रेणु का अपहरण साल 2003 में बीहड़ के कुछ डाकुओं ने किया था। रेणु ने भी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। खबरें है कि रेणु जल्द ही राजनीति में कदम रखने वाली है ।                    
 

दस्यु-सुन्दरियों का एक किस्सा गौरतलब है

'दस्यु सुंदरियों' की ये कहानी हर बार यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि जो उत्तर-प्रदेश देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है और जिसे उत्तर से उत्तम प्रदेश बनाने का सपना लिए हर बार सरकार बागडोर थामती है और कई क्षेत्रों में इसे साबित भी करने की कोशिश करती है। ऐसे में, फिर राज्य में लगातार बढ़ती आतंक की ऐसी घटनाएँ जहाँ एक तरफ मानवता को शर्मसार करती है, वहीँ दूसरी तरफ, हमारे देश की राजनीति के एक ऐसे पहलु को सामने रखती है, जो अप्रत्यक्ष ढंग से वास्तविक राजनीति है। जहाँ वे इस आतंक को अपनी राजनीति के अहम मुद्दे के साथ अपना दाहिना हाथ भी बनाए रहते है। इन तीनों 'दस्यु सुंदरियों' में कई समानताएं गौरतलब है-

1-इन तीनों का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिलों से रहा है। 

2- इन सभी के 'दस्यु सुंदरी' बनने की दास्तां का गवाह बीहड़ के जंगल साक्षी बने।

3-सभी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और सबसे अहम - इन तीनों दस्यु सुंदरी को समाजवादी पार्टी नें ही टिकट देकर राजनीति में उतारा।

यहां विचारणीय है कि फूलन देवी से लेकर रेणु यादव तक ने सरकार के सामने अपनी दस्यु-सुंदरी बनने की दास्तां सामने रखी। अब सवाल यह है कि इसके बावजूद,

1-      आखिर क्यों आजतक बीहड़ के खौफनाक सन्नाटे का आतंक अभी तक जीवंत है?  

2-      क्यों आजतक बीहड़ की चुप्पी पर सरकार ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी?

3-      क्या कभी इन दस्यु सुन्दरियों ने उस बीहड़ में सुधार करने का नहीं सोचा?

4-      क्या औरों की तरह सत्ता में आने पर वे ब्राह्मणवादी सोच का शिकार हो गई या उनका शिकार जानबूझ कर किया गया, जिससे वे इस राजनीति के इस आतंक के कंधे को न काट दें?

5-      क्यों बीहड़ के सन्नाटों में अपनी ललकार से पहचानी जाने वाली ये दस्यु सुंदरियाँ राजनीति की देहलीज़ पर कदम रखते ही सन्नाटे के अंधेरों में गुम हो जाती है?         

         
   सवाल कई हैं लेकिन इनका जवाब ना तो हमारे देश की राजनीति दे पाती है और ना ही बीहड़ के वो सन्नाटे। पर इन दोनों के सन्नाटों के बीच जब हर बार एक 'दस्यु सुंदरी' बनकर हमारे सामने आती है तो ये सन्नाटे भी चीख-चीख कर यह सवाल करने लगते हैं मौजूदा व्यवस्था के उन जिम्मेदार लोगों से जो कानून को तथाकथित रसूख़दार माननीयों के सुविधानुसार अनुसार विवेचित करते हैं। जिन्हें नारी का उनके बराबर खड़े होना गवारा नहीं है| जो अपने अहम् और यौन कुंठा की तुष्टि के लिए बार-बार दस्यु सुन्दरी बनने के लिए किसी गरीब की बेटी को बाध्य करते हैं।

आज ज़रूरत है इस सोच को बदलने के लिए एक सकारात्मक-सार्थक व वैकल्पिक व्यवस्था में विश्वास सृजित व जागृत करने की| जहाँ बीहड़ के लोगों को सुरक्षा के साथ विकास के समान अवसर उपलब्ध हों। ज़रूरी है कि बीहड़ों के सन्नाटे मासूम बच्चियों की चीख़ नहीं बल्कि खिलखिलाहट के साथ गुन्जायमान हो।

हमें समझना होगा कि दस्यु सुन्दरियाँ सिर्फ मसालेदार फ़िल्मों की पटकथा की पात्र  नहीं हैं| बल्कि वे ग़रीबी व बेचारगी के सलीब पर चढ़ी वे नायिकाएँ हैं जो समाज द्वारा कई बार यातना-प्रताड़ना की कीलें ठोके जाने से मरने के बाद प्रतिशोध की अग्नि से उत्पन्न बीहड़ों को विवश होकर गले लगाती हैं।

स्वाती सिंह 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

विशाल भारत की सिकुड़ती 'बदहाल सड़कें'

सड़क' परिवहन का एक ऐसा माध्यम होता है जिसपर पूरी सभ्यता,संस्कृति या यूँ कहे पुरे देश के विकास का दारोमदार होता है। ये सड़कें ही तो है, जो हमें किसी नई जगह तक पहुंचती है और वहां की संस्कृति से हमें रु-ब-रु कराती हैं। सड़कों पर दौड़ते साधनों से, जहाँ एक ओर हम वहां के विकास दर का पता लगाया जा सकता है तो वहीं दूसरी तरफ, इन सड़कों के किनारे बसे बाज़ार और गाँव-घर से लोगों के जीवन-स्तर व जीवन-शैली और पूरी अर्थव्यवस्था का पता लगाया जा सकता है।अब सोचिए अगर भारत जैसे विशाल देश की चार लाख सत्तर हज़ार किलोमीटर तक फ़ैली सड़कें देश के यानी एक वर्ग किलोमीटर पर 0.66 किलोमीटर तक सिकुड़ती सड़कें कैसे देश के हर कोने को छू पाएंगी? और इसका देश के विकास और संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है।
         आज़ादी के लगभग साठ सालों के बाद भी क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश सच में लोकतान्त्रिक बन पाया? ये प्रश्न अब भी लोगों के प्रश्नों से घिरा है। आज़ादी के बाद से कृषि से लेकर संचार तक,शिक्षा से लेकर सामाजिक सुधार तक बहुत कई सफल काम किए गये। लेकिन अफ़सोस,सरकार की तरफ से इन सबके मूल आधार की संरचना के विकास पर कोई ख़ास कदम नहीं उठाए गये। आज भी हमारे देश में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुचने का सड़क ही एकमात्र साधन उपलब्ध है। इसके अलावा लोकल ट्रेन व मेट्रो जैसी सुविधाएँ कुछ शहरों तक ही सिमटी है,जो सड़क जाम की समस्या को सुलझाने में कहीं भी सफल नहीं दिखाई पड़ रही। जिसका अंदाजा दिल्ली,कलकत्ता,चेन्नई जैसे मेट्रों सिटी में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और जाम की समस्या से लगाया जा सकता है।
        भारत में सिकुड़ती इन बदहाल सड़कों की समस्या के कारणों पर अध्ययन करने पर पता चलता है कि यहाँ तीन चीज़ों सबसे ज्यादा अभाव है-शिक्षा,तकनीक और इन्हें लागू करने का अप्रभावशाली तरीका। भारत में हर साल थोक के भाव युवा इनजीनियर की भर्ती सड़क निर्माण विभाग में की जाती है तो वहीं दूसरी ओर सड़क टूटने,अतिक्रमण और फ्लाईओवर टूटने की घटनाएँ भी सामने आ रही है। भारत में स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करने वालों और आधुनिक वाहनों का प्रयोग तो बहुत जमकर किया जाता है,लेकिन जब बात आती है सड़क-निर्माण की तो वही बरसों पुरानी गिट्टी-अलकतरा की तकनीक ही लागू की जाती है।कमी सिर्फ यहीं तक नहीं लोगों के व्यवहार और शिक्षा व तकनीक को लागू करने में भी है।
        भारत में अधिकांश लोग ऐसे है जिन्हें अपने रोटी,कपड़ा और मकान के अलावा हर चीज़ बेगानी नजर आती है,जिसका नतीज़ा ये होता है कि सड़क-परिवहन के किसी भी नियम से ये अपना कोई वास्ता नहीं रखते। नतीजन सड़क दुर्घटना की वारदातें बढ़ती जा रही है। इसलिए शिक्षा,तकनीक के साथ-साथ लोगों की सोच में परिवर्तन होने के बाद ही सिकुड़ती इन बदहाल सड़कों का विस्तार और देश का विकास संभव होगा।

स्वाती सिंह

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

यहूदी की लड़की

भारत के सबसे प्रतिष्टिठित थिएटरों में से एक है, दिल्ली का श्री राम सेण्टर थिएटर । 1975 में बने इस थिएटर पर एक बार अभिनय करने का सपना भारत के हर एक कलाकार के मन में पलता है,लेकिन बहुत कम ही सौभाग्यशाली कलाकार इस मंच पर अभिनय कर पाते है। हर साल भारत के कोने-कोने से गिनेचुने कुछ बेहतरीन नाटकों का मंचन यहाँ किया जाता है। हर साल की तरह, इस बार भी श्री राम थिएटर के 'थिएटर फेस्टिवल- मंचनाद' में भारत के गिने-चुने कुछ बेहतरीन नाटकों को सम्मिलित किया गया है,जिनमें से एक नाटक बीएचयू से चुना गया है। जो उत्तर-प्रदेश से चुना जाने वाला एकमात्र नाटक है।  
        बीएचयू से चुने जाने वाले इस नाटक का नाम 'यहूदी की लड़की ' है, जिसे आज से करीब सौ साल पहले सन 1915 में आगा हर्श कश्मीरी ने लिखा था। आगा हर्श कश्मीरी को उर्दू का शेक्सपियर कहा जाता है,जिनका ताल्लुक हमारे बनारस से रहा है। आगा हर्श के लिखे इस नाटक का निर्देशन बीएचयू के मनोविज्ञान विभाग के छात्र रजनीश कुमार ने किया है, जिसे इस साल श्री राम सेंटर ने अपने थिएटर फेस्टिवल-'मंचनाद' के लिए चुना गया है। ये नाटक 'काशी रंगमंडल' के बैनर तले किया जा रहा है।    इस नाटक का मंचन सबसे पहले 6 अक्तूबर 2013 को बीएचयू के स्वतन्त्रता भवन में किया गया था। जिसे 9 फ़रवरी 2014 को लखनऊ नेशनल थिएटर फेस्टिवल में भी चुना जा चुका है। अब ये नाटक दिल्ली के श्री राम सेण्टर( मंडी हाउस ) में 3 नवम्बर 2014 को शाम छह बजे से होने वाला है।    

     सौ साल पहले एक यहूदी की लड़की पर लिखे इस नाटक को निर्देशक ने, आज के समय से जोड़कर ऐसी जान फूंकी दी कि इसकी सफलता के दरवाज़े एक के बाद एक खुद-ब-खुद लगातार खुलते जा रहे है।लेकिन अफ़सोस इस सफलता के बिगुल की आवाज पूरे भारत में तो फ़ैल रही है पर अपना शहर और वो विश्वविद्यालय,जिनके ये छात्र है वे इनकी सफलता से बिल्कुल अनजान है। इस नाटक में कुल बीस छात्र अभिनय कर रहे है,जो बीएचयू के अलग-अलग संकाय है। इन कलाकारों में,प्रखर दुबे, राजकुमार, निधी श्री, सौरभ मिश्रा, अनुपम कुमार सिंह, सना सबा, सूरज प्रताप सिंह, अनुराग पांडे, नितीश कुमार, आशुतोष गाँधी,अमन श्रीवास्तव, वरुण कपूर, विकास यादव, मो.सिकंदर, प्रदीप यादव, अंकिता सिंह, विवेक सिंह, आर्यन श्रीवास्तव, अरुण कुमार किरण, आदित्य सिन्हा है। 

       इन सभी छात्रों ने आज से तीन साल पहले मिलकर एक टीम के रूप में काम करना शुरू किया। जिनका मूल उद्देश्य बीएचयू में सांस्कृतिक रचनात्मकता का सृजन कर,गुम होते कलाकारों को एक सही व योग्य मंच उपलब्ध कराना और छात्रों के भीतर छुपी कला को खोज निकालना था। आखिर इन छात्रों की मेहनत आज रंग लायी और ये युवा आज सफलता के उस मुकाम पर खड़े है जहाँ तक पहुंचने में कितने कलाकारों की उम्र निकल जाती है। लेकिन हमारे बीच इन अदभुत प्रतिभाओं को आज अपने पंजीकरण के लिए जहाँ अन्य थिएटर मंडलों का मुंह निहारना पड़ रहा है तो वहीं नाटक की पूरी तैयारी का खर्च ये छात्र खुद उठाने को मजबूर है। ना तो इन्हें इनके विश्वविद्यालय की तरफ से कोई सहायता प्रदान की जा रही है ना ही सरकार की तरफ से जो बेहद दुखद है।लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद,इन छात्रों लगन रंग लायी और अब इन नादान परिंदों के पंखों की उड़ान अब आकाश की ऊँची बुलंदियां छूने को आतुर है।

 युवाओं के इस जज्बे को सलाम।

स्वाती सिंह

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

'काबिल बने कामयाबी खुद आपके पीछे आएगी।'


आजकल हर अख़बार और न्यूज़-चैनलों में युवाओं के विरोध-प्रदर्शन सुर्ख़ियों में है। सिविल परीक्षाओं में सी-सैट लागू होने से गुस्साए छात्र अलग-अलग युवा-छात्र संगठन के बैनर तले प्रदर्शन करते सड़कों तक उतर आए। सी-सैट में भाषा को लेकर हुए बदलाव से हिन्दी-भाषी छात्र सबसे ज्यादा गुस्साए है। इन छात्रों का मानना है कि इस नये पैटर्न में हिन्दी को स्थान नहीं दिया गया,जो सरकार की हिन्दी-भाषी क्षेत्र के खिलाफ़ जानबूझकर बनाई योजना है। जिसके खिलाफ़ वे प्रदर्शन कर रहे है।             
         पुरे भारत में मूलत: दो प्रदेशों( यूपी और बिहार ) में ये विरोध-प्रदर्शन सबसे ज्यादा देखने मिल रहा है। विरोध करते छात्रों की इतनी अधिक संख्या देखकर ऐसा लगता है कि शिक्षित युवाओं का प्रदर्शन नहीं, पगलाई भीड़ का प्रदर्शन है जिनकी न तो कोई सोच है न कोई दिशा। दुनिया के शक्तिशाली देशों में से एक देश के युवाओं का ऐसा प्रदर्शन करना, कहीं-न-कहीं वहां युवाओं के लिए उपलब्ध अवसर पर सवाल खड़े कर देते है। युवाओं के इस तरह के प्रदर्शन ऐसा लगता है कि मानो सिविल सेवाओं के अलावा इनके पास कोई विकल्प ही नहीं है।            
         इसके साथ ही,भाषा को संचार का माध्यम होता है,जो किसी के ज्ञान का मानक नहीं होता है।लेकिन भाषा को मुद्दा बना कर लगातार राजनितिक पार्टियों के युवा-संगठन अपनी रोटियां सेंक रहे है और इन सबमें युवाओं का बिना सोचे-समझे सड़क पर उतरना बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं लगता। ये प्रश्न हमारे देश के भविष्य को भी प्रश्न-चिन्हित कर देती है। ये पूरी घटनाक्रम को देखकर इन युवाओं के लिए आमिर खान की एक फिल्म का डायलाग याद आता है कि-" काबिल बनो,कामयाबी झकमार कर पीछे आएगी।"

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

'अमिताभ की संघर्ष-कथा'


युगांक वीर द्वारा लिखी इस किताब को पढ़ा....बहुत दिनों से सदी के महानायक-'अमिताभ जी' के बारे में पढ़ने का मन था।तभी किताबों की बीच छुप्पी इस किताब पर नजर गयी,जिसे काफ़ी दिन पहले खरीदा था। बिग बी के बारे में और ज्यादा जानने की ललक से बड़े अरमानों के साथ किताब पढ़ना शुरू किया।जैसे-जैसे किताब की पन्ने पलटे गई ,मानो सारे अरमानों पर जैसे पानी फिरता सा महसूस हुआ। किताब का कवर यूँ तो पूरी तरह अमिताभ जी को समर्पित है,जिसे देख कर लगता है कि किताब में अमिताभ जी से जुड़ी जानकारियां होंगी। जानकारियों को लेखक ने कहानी की तरह बताने की कोशिश की है और बीच-बीच में कविता की कुछ पंक्तियों के माध्यम से जया और अमिताभ जी के प्रेम-प्रसंग को प्रस्तुत किया। लेकिन इन खूबियों के बावजूद लेखक प्रारंभ से लेकर अंत तक भ्रमित लगे,कि आखिरकार वे जानकारी किसके बारे में देना चाहते है समझ ही न आया। किताब के पहले पेज पर ये अंकित किया गया था कि किताब डा.हरिवंशराय बच्चन,ख्वाजा अहमद अब्बास और हृषिकेश मुकर्जी को समर्पित।अमिताभ जी के जीवन में इनकी भूमिका की जगह उनकी उपलब्धियों के बखान पर ध्यान ज्यादा केन्द्रित किया गया।इसके साथ ही, पूरी किताब के ज्यादातर पेज अमिताभ के समकालीन उभरते फ़िल्मी सितारों और निर्देशकों की फिल्मों की कहानी पर समर्पित थे। अमिताभ जी के बारे छुट-पुट जानकारी पाठक किताब में चुने बिना नहीं पा सकता।
अंत में,इस तरह की किताब लिखने वाले समाज के महान लेखकों और इन्हें प्रकाशित करने वाले प्रकाशन केन्द्रों से ये अनुरोध है कि कृपा करके किताब का कवर और नाम का चयन किताब के विषय के अनुसार करें। जिससे पाठक को हवाई बातों की अपेक्षा विषय की सही जानकारी मिले और वे आसानी से अपनी रूचि के अनुसार किताबे प्राप्त कर सके।

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

हैदर':- इंतकाम से आज़ादी तक का सफ़र

2 अक्टूबर,2014 को रिलीज हुई,विशाल भारद्वाज की फिल्म- हैदर।           
         गाँधी-जयंती पर आई इस फिल्म ने खूबसूरत वादियों वाली जन्नत -'कश्मीर', के सन्नाटों में कैद 'आज़ादी' की चीख को मानो दर्शकों के सामने पर्दे पर उतार दिया। शाहिद कपूर,श्रद्धा कपूर,तब्बू,इरफ़ान खान व केके मेनन द्वारा अभिनीत इस फिल्म के माध्यम से विशाल भारद्वाज ने, खूबसूरत वादियों के चारों तरफ घिरे लोहे के बाड़ों और फ़ौज की तैनाती में कसी  घुट-घुट कर आज़ादी की पुकार लगाती जिंदगियां तो वहीं दूसरी तरफ,श्रापित इंसानियत का शिकार होकर मानवता के खून से लहूलुहान झेलम की चुप्पी को बड़े ही सम्वेदनशील अंदाज में फिल्माया है और बरसों से बर्फीली कब्रों में ढके इन मुद्दों को पर्दे पर उतार कर एक नयी जान फूंक दी है। हैदर के जरिए, खुद के अस्तित्व को तलाशते इंसान की जिंदगी को सामने लाया गया ह जहाँ वो पलपल सोचता है कि -' दिल की सुनु  तो तू है,दिमाग की सुनु तो तू नहीं। जान लूँ की जान दूँ,मैं रहूँ कि मैं नहीं।'      
            इस फिल्म को देखकर शुरू से लेकर अंत तक जेहन में बस एक शब्द गूंजता है-'इंतकाम'। इंतकाम की इस लड़ाई में एक इंसान की क्या हालत होती है जब वो अपने आप से, अपने परिवार से,अपने लोगों की श्रापित इंसानियत का शिकार होकर किस कदर हरपल घुट-घुट कर जीता है और उसके कदम कितनी बार लड़खड़ाते है सम्भलते है,इस हर एक पल के एहसास को महसूस करने के लिए ये फिल्म दर्शकों को मजबूर कर देती है। सरहद की लड़ाई से लेकर अपनों की लड़ाई तक, इंतकाम के आगाज़ से लेकर,इंतकाम से आज़ादी तक की कहानी को विशाल ने हैदर में समेटा है। इस फिल्म ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बॉलीवुड में 'रंगीन मसालों' के बिना भी सफल फ़िल्में बनाई जा सकती है। जिसका श्रेय निर्देशकों के साथ-साथ उस दर्शक वर्ग को भी जाता है जिन्हें अब खूबसूरत वादियों में फिल्माया रोमांस रास नहीं आता। अब वो इन खूबसूरत वादियों की पीछे छिपे इसके सच को जानना चाहते है।  फिल्म के अंत में,तब्बू का 'इंतकाम' को लेकर तब्बू का अंतिम डायलाग जो मुझे पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा पसंद आया आप सभी से शेयर करना चाहूंगी-
" इंतकाम से सिर्फ इंतकाम पैदा होता है और जब तक हम इंतकाम से आज़ाद नहीं हो जाते,तब तक हमें कोई आज़ादी आज़ाद नहीं कर सकती।"

स्वाती सिंह

रविवार, 28 सितंबर 2014

"मुझे यकीन होता है,कि यहाँ किसी पत्थर में चमकता हीरा नहीं है।" .....

कल दोपहर(26-09-2014) बीएचयू के राधाकृष्णनन सभागार मे एक भव्य कार्यक्रम का आयजन किया गया।सभागार के द्वार की दीवारों पर लगे मुक्तिबोध जी की कविता-पोस्टर और पुस्तक-प्रदर्शन देखकर इस कार्यक्रम की भव्यता का अंदाज़ा लग गया था।कविता-पोस्टर में,मुक्तिबोध जी एक कविता देखी-

" मुझे भ्रम होता है,कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है।" बेहद पसंद आई ये कविता।
लेकिन जब पूरे कार्यक्रम के बाद जब बाहर निकलना हुआ तो यूँ लगा कि मानो इस कविता की पंक्तियाँ पूरी तरह उल्ट कर -"मुझे यकीन होता है,कि यहाँ किसी पत्थर में चमकता हीरा नहीं है।" बन गई हो।

सभागार के बाहर दीवारों पर जहाँ हर तरफ कविता-पोस्टर था तो वहीँ दूसरी ओर पुस्तक-प्रदर्शनी।पुस्तक-प्रदर्शनी का काम दो छात्राएं देख रहीं थी,जो हिंदी विभाग की थी और जहाँ तक मेरी जानकारी है उनमें से एक संयोजक महोदय जी की शोध-छात्रा थी।जिन्हें कबीर से उत्तर-कबीर तक वाले कार्यक्रम में भी पुस्तक-प्रदर्शनी में पुस्तक की दुकान पर देखा था।इसके बाद,पूरे कार्यक्रम में मंच पर बैठे अध्यक्ष-मंडल में मेरी निगाहें किसी महिला-कवियत्री को खोजती रहीं। लेकिन पूरे कार्यक्रम में उनका नामों-निशान तक नहीं मिला। अब बात आयी,युवतम कवि की,जिनमें कुल पांच कवियों ने कविता-पाठ किया।इनमें से मात्र दो छात्राएं(एम.ए द्वितीय वर्ष) की  थी।
इन सबके बाद दिमाग में आये इन सवालों ने कविता की उस पंक्ति को उल्ट दिया :-
*हमेशा स्त्री-विमर्श और स्त्री से जुड़े हर मुद्दे पर खुद को प्रगतिशील बताने वाले हमेशा लोगों को सिमोन की किताबें पढ़ने की सलाह देने वाले बुद्धिजीवी ऐसी गलती कैसे कर सकते है?
*बनारस से दिल्ली तक के सफ़र में,क्या इन्हें एक भी योग्य महिला-कवियत्री नहीं मिली जो इनके अध्यक्ष-मंडल में शामिल होने हो?
*बाज़ार और पूंजीवाद पर हमेशा बड़ी-बड़ी बात करने वाले क्यों हर बार उसी बाज़ार के नियमों पर चलते है?
*क्यों वे दुकान पर पुस्तक-बेचने के लिए हर बार लड़कियों को ही चयनित करते है?
*क्या उत्तर कबीर के युवतम-कवियों में बुद्धिजीवियों का विभाग मात्र दो युवा-महिला कवित्रियों को तलाश पाया?
*क्या पुस्तक-प्रदर्शनी की दुकान पर बैठी छात्राओं ने कभी कोई कविता या कहानी लिखी नहीं होगी? क्या इनपर पारखियों की नज़र नहीं पड़ी या जानबुझ कर नजरअंदाज़ कर दिया गया?
विभाग के एक प्रगतिशील और बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा जानेअनजाने में इतनी बड़ी भूल करना,समाज में गलत संदेश देता है।इन सभी बिन्दुओं पर जल्द-से-जल्द विचार कर प्रयोग में लाने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो की बहुत देर हो जाए और इन अभी उपमाओं के आगे 'तथाकथित' की उपमा अपना नाता जोड़ ले।
यूँ तो सवाल बहुत है लेकिन प्रचार के बाज़ार में वाह!वाह! की तेज़ आवाज़ वाले डीजे में क्या ये बात सही कानों तक पहुँच पाएगी? ये नहीं  पता...पर आवाज़ पहुचाने की कोशिश हमेशा जारी रहेगी। 

      आखिरकर ये कोशिश कुछ रंग लायी और मेरे प्रश्न सही कानों तक पहुँचे। जहाँ सही लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी बात रखी और सीधा निशाना मुझ पर साधा। प्रतिक्रिया सफाई, प्रश्नों, मतों और सलाहों में लिपटे आरोपों से पूर्ण था।

* पहली सफाई, अध्यक्ष-मंडल में महिलाओं की उपस्तिथि को लेकर थी। जिसमें,कहा गया कि महिला प्रोफेसरों ने नवरात्र का व्रत रखा था,इसलिए वे आमंत्रित करने के बाद भी नहीं आ सकी।            

जिस दिन ये कार्यक्रम हुआ वो नवरात्र का दूसरा दिन था और सिर्फ वे लोग ही नवरात्र के दूसरे दिन व्रत रखते जिन्हें पुरे नौ दिन तक व्रत करना होता है। तो क्या बनारस से लेकर दिल्ली तक की सभी हिन्दी-साहित्य से जुडी महिलाएं नवरात्र के नौ दिन तक व्रत रहती है। ये तर्क कम बहाना ज्यादा नजर आता है। खैर,विभाग के युवतम कवियों में मात्र दो छात्राओं की उपस्तिथि के बारे में क्या कहना चाहेंगे आप सब लोग? 

*  दूसरा प्रश्न,मेरे साहित्य-ज्ञान पर किया गया।

अब  इन सबका साहित्य-ज्ञान से क्या लेना-देना? मैंने मुक्तिबोध जी पर या किसी काव्य-पाठ करने वाली की गुणवत्ता पर कोई प्रश्न नहीं किया। और यदि इस बात पर माननीय बुद्धिजीवी इतना ज़ोर दे ही रहे तो मेरा प्रश्न ये है कि आपके पास तो मुझसे कई गुना ज्यादा साहित्य-ज्ञान है और कहा जाता है कि साहित्य आपको संवेदनशील बनाता है और आपलोगों इतनी असम्वेदनशीलता के साथ इतना बड़ा कार्यक्रम करवाना, कहीं ना कहीं आपकी गुणवत्ता को प्रश्नचिन्हित करता है।

* तीसरी सलाह मुझे पत्रकारिता के सिद्धांत को लेकर दी गयी। जिसमें कहा गया कि बिना छान बीन किये हमने कैसे ये प्रश्न खड़े कर दिए, इससे पता चलता है कि मुझे पत्रकारिता के सिद्धांत की समझ नहीं है।

साहब! सबसे पहले आपको बता दूँ कि हमने कोई फैसला नहीं सुनाया और ना ही किसी खबर को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। पुरे कार्यक्रम में खुद मौजूद होने के बाद मैंने अपने प्रश्नों को सामने रखा है। जो कि पत्रकारिता के सिद्धांत के बिलकुल अनुकूल है। और जहाँ तक रही बात छानबीन की तो आपको बता दूँ कि इस कार्यक्रम के आयोजक महोदय से मेरी जान पहचान उतनी ही है जितनी की आप सभी की और इसी साल अप्रैल में वे मेरे एक कार्यक्रम में वक्ता भी थे और इस कार्यक्रम का पूरा आयोजन उनके निर्देशन में हुआ, जो उनके व्यक्तिव के बिलकुल विपरीत लगा। महोदय! जब कोई फिल्म थिएटर में लगती है जिनके कुछ दृश्य दर्शकों को नहीं भाते तो एक आम आदमी से लेकर मीडिया तक फिल्म-निर्माताओं से प्रश्न करती है। और तथ्यों से साथ इन प्रश्नों का जवाब देना उनकी जिम्मेदारी होती है। खुद को हमेशा प्रगतिशील और बुद्धिजीवी बताने वाले कार्यक्रम के संयोजक महोदय जैसे सम्मानित लोग ऐसी गलती  इतने बड़े मंच पर करे तो समाज में इसका क्या संदेश जाएगा? हमें इस बात पर गौर करना चाहिए क्यूंकि इस तरह की चीज़े एक इंसान को ही नहीं पुरे संस्थान और शिक्षा-प्रणाली को कटघरे में खड़ा कर देती है।             

* चौथा मत मीडिया को लेकर दिया माननीय लोगों के अप्रत्यक्ष प्रत्याशी ने दिया। उनका कहना था कि आज मीडिया की हालत देखी जा सकती है कि वे लोग कितनी असम्वेदनशीलता के साथ काम कर रहे है और आप ( मै ) भी उसी सिद्धांत पर काम कर रही है ।           

सज्जन से कहना चाहूँगी कि उन्होंने एकदम सटीक बात कही कि मीडिया सम्वेदनहीन होकर काम कर रहा है। जिसका उदाहरण है कार्यक्रम के दूसरे दिन का अखबार जहाँ हर तरफ इस कार्यक्रम की वाहवाही ही भरी थी। उनकी रिपोर्ट में दूर-दूर तक मेरे पूछे एक भी प्रश्न का एक अंश तक नहीं था।                            

 फेसबुक पर इन लम्बी बहसों से एक और बात सामने आयी कि अगर वास्तव में इन दी हुई सभी सफाईयों में एक प्रतिशत भी सच्चाई होती तो कमेंटकर्ताओं में कम-से-कम एक महिला या कार्यक्रम में उपस्तिथ किसी छात्रा का भी नाम शुमार होता।।।

इस पूरी बहस का दायरा कुछ प्रश्नों,मतों,आरोपों और सलाहों में सिमट कर रह गया। जो बेहद दुखद था। 

स्वाती सिंह